Friday, November 21, 2008

जिंदगी

बेचारगी लाचारगी, यह जिंदगी बर्बाद है. 
दर्द जुते, ग़म पड़े, परेशानियों की खाद है,
 क्यूँ जिंदगी नाराज़ है ? 

 बन रहा, बिगड़ रहा, हालातों से झगड़ रहा,
 पर यह नसीब क्यूँ नाराज़ है? 

 मौत है, जशन है, आधा उढा क्यूँ कफन है ?? 
मौत हो, पूरी हो, जिंदगी से इतनी सी फरियाद है. 

 साथ हों, पास हों, ना आइने नाराज़ हों , अधुरा सा यह एक ख्वाब है. 


अन्नू

Wednesday, November 5, 2008

भिखारी

एक भिखारी आता था मेरे गाँव के पुराने घर मैं.
टूटी चप्पल, मौलाना दाडी, और तुलसी माला लिए कर मैं.
क्या नाम? कौन जात? किसको पता?
भिखारी था, छोटी बिसात......शायद समाज सता.

मां रात की बांसी रोटी, और अमीरन चची कल का साग दे देती थी,
आधी बहार चबूतरे पर बैठ कर खाता,
आधी अपने मैले झोले मैं सहेज कर ले जाता.
मुंह से कभी कुछ नहीं बोला .............
उसकी आँखें झोली भर दुआएं दे देती थीं.
मां रात की बांसी रोटी, और अमीरन चची कल का साग दे देती थी,

आधी रोटी किसको खिलाता है?
इसका अगला पिछला कौन है?
इसकी जुबान क्यूँ इतनी मौन है?
किसकी बंदगी इस कद्र शिद्दत से निभाता है?
आधी रोटी किसको खिलाता है?

एक शाम चुपके से पीछा किया उसका,
जानना था - क्या नाम? कौन मज़हब? कहाँ धाम है उसका?
आखिर आधी रोटी किसको खिलाता है?
किसकी बंदगी इस कद्र शिद्दत से निभाता है?

सर्दी की शाम पड़े,
हम उसके पीछे कोस चले,
मज्जिद गयी, मंदिर गया, अब मेरा चैन भी गया.

तभी एक आवाज़ ने ध्यान खिंचा,
भिखारी की आहत पाकर, खुश होता, कुं कुं आता चितकबरा सफ़ेद कला कुत्ता.
उसके पैरों मैं आकर लोट जाता है.
भिखारी कुत्ते को गोद उठा कर मुस्कराता है,
साथ बिठा कर रोटी खिलाता, मंत्र सिखाता, आयतें सुनाता है,
और कम्बल साथ ओढ़ कर सो जाता है.
इस कुत्ते की बंदगी यह शिद्दत से निभाता है.

पिछली रात गाँव का सौहार्द बिगडा था,
एक और हिन्दू मुस्लमान दंगा भड़का था.
हम ठीक है, अमीरन चची भी साथ है,
जानते हैं दंगों में राजनीती की हाथ है.
लेकिन उस भिखारी का खून हुआ है,
पेट में त्रिशूल और गले पैर गंडासे का घाव मिला है.
साथी ही कुत्ते का खुनसना जिस्म पड़ा है.

अन्नू.